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Aaj ka Suvichar 08/12/2018

अगर हम नहीं देश के काम आये।
धरा क्या कहेगी गगन क्या कहेगा?
चलो श्रम करें देश अपना संवारें।
युगों से चढ़ी जो खुमारी उतारें॥
अगर वक्त पर हम नहीं जाग पाये।
सुबह क्या कहेगी पवन क्या कहेगा?
मधुर गंध का अर्थ है खूब महके।
पड़े संकटों की भले मार चहके॥
अगर हम नहीं पुष्प सा मुस्कराये।
व्यथा क्या कहेगी चमन क्या कहेगा?
बहुत हो चुका, स्वर्ग भू-पर उतारें।

Aaj ka Suvichar 22/11/2018

” वेद ” …पढ़ना आसान हो
सकता है ….लेकिन
किसी की ” वेदना ” पढ़ना
बहुत कठिन है !
“जीवन” कितना जिया
यह महत्वपूर्ण नही है ।।
किस ” भाव ” से जिया
यह अधिक महत्वपूर्ण है !

14 नवंबर 2018

नेहरू जी की विरासत को कमतर करने की हो रही कोशिश :
कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी ने मंगलवार को कहा कि मौजूदा समय में सरकार में बैठे लोगों के द्वारा पंडित जवाहर लाल नेहरू की लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान वाली विरासत को कमतर करने का प्रयास किया जा रहा है.
आधुनिक भारत के निर्माण में देश के प्रथम प्रधानमंत्री के योगदान को याद करते हुए यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि नेहरू ने जिन लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाया, आज उनको चुनौती दी जा रही है. वह कांग्रेस सांसद शशि थरूर की पुस्तक ‘नेहरू: द इन्वेंशन ऑफ इंडिया’ पुनर्विमोचन के अवसर पर बोल रही थीं. उन्होंने कहा कि नेहरू ने देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओ के प्रति सम्मान और उनको मजबूत बनाने की संस्कृति पैदा की जिससे लोकतंत्र मजबूत हुआ.
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने नेहरू के आर्थिक मॉडल और गुटनिरपेक्षता केंद्रित विदेश नीति को भी याद किया और कहा कि उन्होंने जिन लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाया था आज उससे जुड़ी विरासत को कमतर करने का प्रयास हो रहा है. वहीं, थरूर ने कहा कि नेहरू ने हमेशा इस विचार को आगे रखा कि देश किसी व्यक्ति से महत्वपूर्ण है और संस्थाओं का सम्मान होना चाहिए.
Posted by :

@Sourabh_Nareti

-स्व.बालकविजी बैरागी

जब धरा पर धाँधली करने लगे पागल अँधेरा
ओर मावस धोस देकर चाट ले सारा सवेरा
तब हारकर यूँ बेठ जाना बुज़दिली है ,पाप है
आज की इन पीढ़ियों को बस यही संताप है
हाय रे अब भी समय है
आग को अपनी जगाओ
बाट मत देखो सुबह की
प्राण का दीपक जलाओ…..
-स्व.बालकविजी बैरागी

आप सभी को दीपावली महापर्व की हार्दिक शुभकामनायें..

आप सभी को दीपावली महापर्व की हार्दिक शुभकामनायें..

आवर्तों का है विषम जाल,
निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई
सभ्यता डूबने जाती है।

जब-जब मस्तिष्क जयी होता,
संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय,
तू यह संवाद सुनाता चल।

सूरज है जग का बुझा-बुझा,
चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई,
आलोक न इनका जगता है,

इन मलिन ग्रहों के प्राणों में
कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर
घिसकर इनको ताजा कर दे।

दीपक के जलते प्राण,
दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को
अपनी अस्थियाँ जलाता चल।

क्या उन्हें देख विस्मित होना,
जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे
सोने-चाँदी के तारों में।

मानवता का तू विप्र!
गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल
जलने भर का अधिकारी है।

ले बड़ी खुशी से उठा,
सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल,
मगर उस का भी मोल चुकाता चल।

– राष्ट्रकवि दिनकर